अमरप्रीत सिंह/सोलन 

सिरमौर जिला के माटल बखोग पंचायत के किसानों के लिए ‘सुखाए गए पुष्पों’ पर दो दिन का प्रशिक्षण शिविर का आयोजन डॉ. वाईएस परमार औदयानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालया, नौणी में किया गया। यह शिविर हिमाचल प्रदेश विज्ञान, तकनीकी एवं पर्यावरण परिषद (HIMCOSTE), शिमला द्वारा विश्वविद्यालय के लिए स्वीकृत परियोजना ‘सुखाए गए फूलों एवं मूल्यवर्धन की तकनीक में शोधन’ के माध्यम से चलाया गया।

फ्लोरीकल्चर और लैंडस्केप अर्चिटेक्चर विभाग के वैज्ञानिक डॉ. भारती कश्यप ने किसानों को सुखाए गए फूलों, उनके महत्व एवं उनसे बनने वाले उत्पादों के विषय में बताया। सुखाए गए फूल आजीविका अर्जित करने वाले विभिन्न प्रकार के पौधों, जिनसे सूखे हुए पुष्प प्राप्त किए जा सकते हैं, से भी अवगत करवाया गया।

सुखाए गए फूलों से बनाए गए उत्पादों की आज राष्ट्रिय ही नहीं अन्तराष्ट्रिय बाज़ार में बहुत मांग है। सुखाए गए फूलों में पुष्प सज्जा, पुष्प डंडी, पॉट-पॉरी, दीवार की तस्वीरें, ग्रीटिंग कार्ड तथा उपहार देने योग्य कई मूल्य वर्धित वस्तुए बनाई जा सकती हैं। भारत के कुल पुष्प निर्यात में से लगभग 70 प्रतिशत तक का निर्यात केवल सुखाए गए फूलों एवं उनके उत्पादों का ही होता है।

डॉ. भारती ने बताया कि हिमाचल प्रदेश की भौगोलिक स्थिति तथा वनों में अनेकों तरह के वन संपधा के होते हुए हिमाचल में भी सुखाए गए फूलों के एक व्यवसाह के रूप में उभरने के काफी आसार हैं। प्रशिक्षण में किसानों को बताया गया कि सुखाए गए फूलों में प्रमुखतह उपयोग में लाए जाने वाले फूल जैसे पेपर फ्लावर, ग्रांफ़ीना, लैगुरस, ब्रिजा, तथा नाइजैला की खेती हिमाचल प्रदेश के लगभग हर हिस्से में की जा सकती है।

इसके अतिरिक्त खादयान फसलें एवं उनके अवशेष जैसे कपास, मक्की, चरी- बाज़रा, अलसी,तिल को भी ड्राइ फ्लावर इंडस्ट्री में इस्तेमाल किया जा सकता है। जंगलों में पाई जाने वाली कई तरह की घास, फर्न, शंकु तथा अन्य पौधों को भी अगर इस व्ययसाय से जोड़ा जाए तो इसे इंडस्ट्री को चार चांद लग सकते हैं। प्रशिक्षण में मक्की के छिलके से बनाए गए उत्पाद जैसे फूल स्टिक्स, गुड़िया तथा चीड़ के शकुओं से कई तरह के उत्पाद प्रशिक्षणार्थियों को शिखाए गए।

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